जयपुर


राजस्थान की राजनीति में सीएम अशोक गहलोत और सचिन पायलट की अदावत जगजाहिर है। लेकिन सीएम गहलोत का सचिन पायलट के पिता राजेश पायलट से भी छत्तीस का आंकड़ा रहा है। गहलोत और राजेश पायलट ने एक साथ ही राजनीति में एंट्री की थी। राजेश पायलट ने उस दौर में युवा गहलोत की बजाय उस समय प्रदेश की राजनीति में अपना वर्चस्व रखने वाले वरिष्ठ नेताओं का साथ दिया था। राजेश पायलट ने गहलोत को कभी नहीं गांठा। कांग्रेस नेताओं का तो यहां तक कहना है कि राजेश पायलट की गहलोत के अलावा नटवर सिंह और नवलकिशोर शर्मा से भी नहीं पटी थी। पूर्व केंद्रीय मंत्री नटवर सिंह अपने गृह जिले भरतपुर से कांग्रेस का टिकट राजेश पायलट को मिलने से नाराज हो गए थे। यहीं वजह थी कि राजेश पायलट भरतपुर से 1980 में चुनाव जीतने के बाद दोबारा भरतपुर नहीं लौटे। नटवर सिंह की नाराजगी की वजह से राजेश पायलट को कांग्रेस आलाकमान ने दौसा शिफ्ट कर दिया था। इससे वरिष्ठ नेता स्वर्गीय नवलकिशोर शर्मा नाराज हो गए थे। राजेश पायलट ने मरते दम तक दौसा जिला नहीं छोड़ा। दौसा पायलट की मुख्य कर्म स्थली बन गया। राजेश पायलट दौसा से लोकसभा का चुनाव जीतकर कई बार सांसद बने और केंद्रीय मंत्री बने।

राजेश पायलट गहलोत को पसंद नहीं करते थे

जानकारों का कहना है कि स्वर्गीय राजेश पायलट सीएम अशोक गहलोत की नाराजगी की वजह के पीछे कई कारण थे। राजेश पायलट और अशोक गहलोत गांधी परिवार के करीबी नेता थे। लेकिन राजीव गांधी हत्याकांड के बाद कांग्रेस की कमान पीवी नरसिम्हा राव के हाथ में आ गई। पूर्व पीएम और राजेश पायलट के बीच पुरानी अदावत थी। पीवी नरसिम्हा राव ने राजस्थान में अशोक गहलोत को आगे बढ़ाया। राजेश पायलट को चिढ़ान के लिए गहलोत को राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। गहलोत की विधानसभा चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव में टिकट वितरण में दखलअंदाजी बढ़ने से राजेश पायलट नाराज हो गए। उल्लेखनीय है कि राजेश पायलट पीवी नरसिम्हा राव मंत्रिमंडल में अहम विभागों का जिम्मा संभाला था। जानकारों का कहना है कि राजेश पायलट और पीवी नरसिम्हा राव के संबंध कभी मधुर नहीं रहे थे। राजीव गांधी हत्याकांड के बाद कांग्रेस में मची सियासी उठापटक के दौरान अशोक गहलोत ने पीवी नरसिम्हा राव का समर्थन किया था। गहलोत और पायलट की नाराजगी बढ़ती चली गई। सीएम गहलोत ने राजेश पायलट की कांग्रेस अध्यक्ष की दावेवारी का खुलकर विरोध किया था। सीताराम केसरी के खिलाफ राजेश पायलट ने चुनाव लड़ा था। गहलोत ने राजेश पायलट का साथ नहीं दिया था।

बैकफुट पर चले गए थे राजेश पायलट

सीएम अशोक गहलोत पहली बार 1998 में राजस्थान के मुख्यमंत्री बने। तब सोनिया गांधी कांग्रेस में सक्रिय हो गई थी। सोनिया गांधी का समर्थन पुराने वफादार अशोक गहलोत को रहा। कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव में सीताराम केसरी से पराजित होने के बाद राजेश पायलट बैकफुट पर चले गए थे। राजेश पायलट सीएम अशोक गहलोत का विरोध भी नहीं कर पाए। इसके बाद वर्ष 2000 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव में पायलट ने सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ रहे जितेंद्र प्रसाद का साथ दिया। इसके कुछ समय बाद राजेश पायलट का एक सड़क हादसे में निधन हो गया। करीब दो दशक बाद हालात बदल गए है। गहलोत पार्टी के वरिष्ठ नेता बन चुके हैं। सचिन पायलट भी युवा नेता के रूप में अपनी छवि बना चुके हैं। सचिन पायलट ने 6 साल तक प्रदेश अध्यक्ष रहने के दौरान अपना एक अलग गुट खड़ा कर लिया है। इस गुट के माध्यम से वह लगातार सीएम गहलोत को चुनौती दे रहे हैं। लेकिन पार्टी के भीतर ही रहकर।

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